शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

जमीं खा गयी आसमां कैसे-कैसे


 नई दिल्ली। साहित्यकारों ने एक ऐसी कल्पित सच्चाई को शब्दों में रच दिया कि कोई असाधारण उपलब्धि हासिल करने के बाद व्यक्ति मन ही मन सोचने लगता है‘आज हम ऊ पर आसमां नीचे’। दरअसल व्यक्ति द्वारा अदम्य साहस,अथक परिश्रम तथा ठोस निष्ठा के बल पर जीवन में प्राप्त की गयीं असाधरण उपलब्धियां उसका नाम आसमां के ऊपर लिख आती हैं। हर दौर में हर जगत का एक असाधारण व्यक्तित्व उस जगत का अपना आसमां होता है,जिसके साये में उस जगत के तारे,सितारे,ग्रह तथा नक्षत्र चमकते रहते हैं। साल 2011 जा रहा है,लेकिन अपने साथ ऐसे ही कई आसमानों को लेते जा रहा है। भारतीय साहित्य, कला, विज्ञान, सेवा तथा खेल की दुनियां के आसमान इसी साल जमीं में समा गये। इंदिरा गोस्वामी,देव आनंद,उस्ताद असद अली खान, भूपेन हजारिका के जाने से उनके कर्मजगत के सिर से एक साया हट गया। कभी ना भर पाने वाले ये घाव देने के लिए ये जगत साल 2011 को हमेशा याद करेंगे।


    साहित्य और संगीत जगत को इस साल सबसे बड़ा घाव पहुंचा है। इंदिरा गोस्वामी(29 नवंबर 11),श्री लाल शुक्ल(28 अक्टूबर 11) तथा अदम गोंडवी(18 दिसंबर 11) के निधन से साहित्य जगत में एक ‘मातम’ पसर गया है। यह साहित्य जगत खासकर हिंदी और असमियां साहित्य जगत को हुई अपूरणीय क्षति है।
 इंदिरा गोस्वामी ने उपन्यास,लघुकथा तथा कविता लेखन में हिंदी साहित्य को उल्लेखनीय योगदान दिया है। अब कहेंगे कि वह थीं,लेकिन उनका योगदान अभी भी है। उसे साहित्य जगत कभी भूल जाएगा तो यह कृतघ्नता होगी।
 श्री लाल शुक्ल ने एक कुशल प्रशासक के रूप में जितनी गहरी निष्ठा से प्रशासकीय सेवा की। उससे कहीं अधिक वफादारी से साहित्य जगत को अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश की। यह मान लेना कि ‘रागदरबारी’ ही साहित्य जगत को दिया गया उनका सर्वश्रेष्ठ था। उनकी दीर्घायु की कामना को झुठलाना होगा।
 यदि शुक्ल जी और जीये होते तो शायद उनका सर्वश्रेष्ठ आ सकता था। इन दोनों ही असाधारण साहित्यसाधकों को इस देश ने ज्ञानपीठ,पद्म पुरस्कारों के अलावा अन्यान्य सम्मानों से सम्मानित कर अपनी कृतज्ञता अर्पित की। अदम गोंडवी को साहित्य जगत से वह सम्मान नहीं मिला,जिसके वह हकदार थे। दुष्यंत कुमार के बाद सात्यि जगत के नये दौर में भाषा और कथ्य समायोजन के साथ दलित साहित्य को ऊंचाई देने में उनका जो योगदान है,उसे कम से कम दलित साहित्य जगत नहीं भूल पायेगा। यह उम्मीद है। अदम की रचनाआें ने उन्हें दलितों में बड़े सम्मान से आदिवासी शायर क ा विशेषण दिला दी है।
 1925 के दिसंबर महीने में नवाब घराने में पैदा हुए मंसूर अली खान पटौदी दुनिया के रंगमंच पर अपनी भूमिका का निर्वाह कर 20 अक्टूबर 2011 को सदा के लिए हमसे दूर चले गये। क्रिकेट जगत हमेश उनका ऋणि रहेगा। क्रिकेट जगत ही क्यों क्रिकेट को दुनिया के रोमांचकारी खेल बनाने में खिलाड़ियों द्वारा किये गये अवदान में उनके योगदान को दुनिया नहीं भूल पायेगी। ऐसी उम्मीद की जा सकती है। भूपेन हजारिका ने संगीत जगत को नयी ऊंचाई दी। वे अपनी इस भूमिका का निर्वाह कर 5 नवंबर 11 को दुनिया से चले गये। ‘ओ गंगा बहती हो क्यों’‘दिल हूम हूम करे’,‘ये किसी की सदा है’। किसकी है? उनकी ही सदा है। वे चले गये लेकिन उनकी ये सदायें उनकी याद हमेशा हमें दिलाती रहेंगी। इन्हें याद करते रहना ही उनके प्रति हमारी सही माने में श्रद्धांजलि होगी। इसी दुनियां का एक आसमान भी इसी साल जमीं में समा गया। इस दुनियां को रुद्र वीणा के तारों से झंकृत और समृद्ध करने वाल उस्ताद असद अली खान का 14 जून 2011 को निधन हो गया।
 रूद्र वीणा को जीवंत विस्तार देकर अपनी झंकार छोड़ गये। अब हम केवल उन्हें श्रद्धांजली ही देते रहेंगे। लेकिन दी जाने वाली श्रद्धांजली भी श्रद्धापूूरित तब होगी,जब हम उनकी रुद्र वीणा के तारों की झंकार से अनूजुंजित होते रहेंगे।
 मॉलीक्यूलर बॉयोलॉजी के जरिये जीव विज्ञान को ऊंचाई देकर एक क्रांति लाने वाले भारतीयमूल के अमेरिकी नागरिक हरगोबिंद खुराना भी इसी साल नवंबर में दुनिया से अंतिम विदाई ले ली। इतनी संख्या में ऐसी अपनी शख्सियत से ऊपर उठ चुकीं शख्सियतों को को अंतिम विदाई देने वाला यह साल कई मायनों में याद रहेगा।

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